मंगलवार, 13 जनवरी 2009

Aaj kaa Sawaal

।। विचार-वीथी ।।

आज का सवाल


प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन

मान्यता थी कि राजनीति के मूल्य शाश्वत नहीं होते अपितु तात्कालिक होते हैं। हमारे देश के कुछ राजनेता जिस प्रकार का आचरण कर रहे हैं उससे लगता है कि राजनीति मूल्यविहीन हो गई है। मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद जब सारा देश आतंकियों से जंग की मानसिकता के साथ एकजुट था ऐसे समय में भी कुछ राजनेता अपनी ढपली अपना राग अलाप रहे थे। मुंबई में आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे तथा मेजर संदीप उन्नीकृष्णन आदि शहीदों को अपनी सच्ची श्रद्धांजलि देने उमड आए लोगों के हुजूम तथा उपस्थित लोगों द्वारा इस प्रकार के राजनेताओं के प्रति अभिव्यक्त नफ़रत के भाव से लोगों की एकजुटता तोडने वाले नेताओं को सबक लेना चाहिए। जिन राजनेताओं के लिए राजनीति का प्रयोजन लोगों की भावनाओं को भडकाकर अपना वोट बैंक मज़बूत करना है उनके ख़िलाफ़ लोगो को एकजुट होकर एक स्वर से शंखनाद करना होगा कि हम सब एक हैं - हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा, हम बुलबुले हैं इसकी यह गुलिशतां हमारा।

सरहद पार से संचालित आतंकवादियों पर काबू पाने के लिए सभी राजनैतिक दलों को परस्पर आरोप प्रत्यारोप की राजनीति छोडकर एकजुट होना चाहिए। उनको भारत की जनता से सबक सीखना चाहिए। यदि ये अब भी सबक नहीं सीखते तो जनता को उन सभी राजनेताओं को सबक सिखाना चाहिए जो जनता का एकता को खंडित करने का उपक्रम करते हैं। तत्काल संघीय जांच एजेंसी का गठन कर उसके अन्तर्गत आधुनिक तकनीक से लैस यूनिट बनाए जाने चाहिए। आतंकवाद का ख़ात्मा करना सरकार का लक्ष्य होना चाहिए। इसके लिए इस्राइल जैसी इच्छा शक्ति एवं अमेरिका जैसी रणनीति के निर्वहन की ज़रूरत है।

हमें उस विचारधारा को निमूZल करना है जो मज़हब अथवा धर्म के नाम पर समाज को विभाजित करती है तथा समाज में ज़हर घोलती है। धर्म के तथाकथित ठेकेदार अपने कुतर्कों से धर्म की मूल चेतना पर कुठाराघात कर रहे हैं। धर्म संप्रदाय नहीं है। ज़िंदगी में हमें जो धारण करना चाहिए, वही धर्म है। नैतिक मूल्यों का आचरण धर्म है। धर्म वह पवित्र अनुष्ठान है जिससे चेतना का शुद्धिकरण होता है। धर्म वह तत्व है जिसके आचरण से व्यक्ति अपने जीवन को चरितार्थ कर पाता है। यह मनुष्य में मानवीय गुणों के विकास की प्रभावना है, सार्वभौम चेतना का सत्संकल्प है। धर्म तो मानवीय दृष्टि को व्यापक बनाता है। धर्म मानव मन में उदारता, सहिष्णुता एवं प्रेम की भावना का विकास करता है। ΄परहित सरिस धरम नहिं भाई, परपीडा सम नहीं अधमाई ΄

मज़हब अथवा धर्म के प्रमुख प्रतिमान रहे हैं - सृष्टि एवं जीवों के कर्ता रूप में ईश्वर अथवा अल्लाह की मान्यता, वर्तमान जीवन की निरर्थकता का बोध, बहिश्त अथवा स्वर्ग की कल्पना ।

धर्म की आड़ में अपने स्वार्थों की सिद्धि करने वाले धर्म के दलालों ने अध्यात्म-सत्य को भौतिकवादी आवरण से ढकने का बार-बार प्रयास किया है। धर्म के इन दलालों की चिन्ता का केन्द्र मनुष्य की वर्तमान समस्याओं का समाधान करना नहीं रहा। धर्म के दलाल मनुष्य को स्वर्ग अथवा बहिश्त में पहुँचकर मौजमस्ती की ज़िंदगी बिताने की राह दिखाते हैं और उपदेश देते हैं कि हमारे माध्यम से आराध्य के प्रति तन-मन-धन से समर्पण करो। धर्म के दलाल आस्था के नाम पर भावनाओं को भडकाते हैं तथा तर्क एवं विवेक को साधना पथ का सबसे बड़ा अवरोधक तत्व मानते हैं। धर्म के दलाल संसार के प्रत्येक क्रिया-कलाप को ईश्वर की इच्छा मानते हैं तथा मनुष्य को ईश्वर अथवा अल्लाह के हाथों की कठपुतली के रूप में स्वीकार करते हैं। वर्तमान की सारी मुसीबतों का कारण भाग्य अथवा ईश्वर की मर्जी को मानते हैं। धर्म के ठेकेदार पुरुषार्थवादी-मार्ग के मुख्य-द्वार पर ताला लगा देते हैं।

नये युग को नये जीवन-मूल्य चाहिए। परिवर्तन सृष्टि का नियम है । सभी धर्मों के आचार्यों को सर्व धर्म समभाव की आधार-शिला पर सामान्य मनुष्य की वर्तमान ज़िंदगी की समस्याओं का समाधान करने, उसकी वर्तमान ज़िंदगी को बेहतर बनाने, समाज में व्यवस्था एवं शांति का निर्माण करने तथा समाज के सभी सदस्यों में परस्पर प्रेम, सद्भाव एवं विश्वासपूर्ण व्यवहार की निर्मिति के लिए अपने अपने धर्म की तदनुकूल व्याख्या एवं मीमांसा करनी चाहिए। आज हमें धर्म के केन्द्र में मनुष्य को प्रतिष्टित कर उसके पुरुषार्थ एवं विवेक को जाग्रत करना है, उसके मन में सृष्टि के समस्त जीवों के प्रति अपनत्व भाव जगाना है। मनुष्य और मनुष्य के बीच आत्मतुल्यता की ज्योति जगानी है जिससे परस्पर समझदारी, प्रेम तथा विश्वास उत्पन्न हो सके। मध्ययुगीन चेतना के केन्द्र में ईश्वर प्रतिष्ठित था। आज की चेतना के केन्द्र में मनुष्य प्रतिष्ठित है। मनुष्य ही सारे मूल्यों का स्रोत है। वही सारे मूल्यों का उपादान है।

आज के मनुष्य को यह चेतना प्रदान करने की आवश्यकता है कि विकास का रास्ता हमें स्वयं बनाना है। किसी समाज या देश की समस्याओं का समाधान कर्म-कौशल, व्यवस्था-परिवर्तन, वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास, परिश्रम तथा निष्ठा से सम्भव है। इस कारण व्यक्ति, समाज तथा देश को अपनी समस्याओं के समाधान करने के लिए स्वयं तत्पर होना हैं, ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए स्वयं प्रयत्नशील होना है। परलोक की चिन्ता करने की अपेक्षा अपनी वर्तमान ज़िंदगी को सुधारने की तरफ़ ध्यान देना ज़रूरी है। स्वर्ग या बहिश्त में पहुँचकर सुख एवं मौज़-मस्ती प्राप्त करने की अपेक्षा आज के मनुष्य को अपने वर्तमान जीवन को संवारने की तरफ ध्यान देना ज़रूरी है। हमें दिव्यताओं को अपनी ही धरती पर उतार लाने का प्रयास करना है। अपनी धरती को ही स्वर्ग अथवा बहिश्त बना देने की तरकीब सोचनी है।

प्रो. महावीर सरन जैन

सेवानिवृत निदेशक (केंद्रीय हिंदी संस्थान)

सुशीला कुँज, 123, हरि इनक्लेव, चाँदपुर रोड़,

बुंलद शहर -203001

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